रायपुर (सलवा जुडूम मीडिया) त्यौहारों की श्रृंखला भले समाप्ति की ओर है, लेकिन देश के विभिन्नआर्थिक सर्वे बता रहे हैं कि इस त्यौहारी मौसम मेंरिकॉर्ड तोड़ खरीदी की गई। खैर आर्थिक समीक्षक खरीदी बिक्री का हिसाब लगाएंगे, इस आर्थिक उछाल की चर्चा के पीछे कारण हैं, लगातार चलने वाले हिन्दू पर्व एवं त्योहार जो न सिर्फ जीवन में हर्षोल्लास भर देते हैं, बल्कि बहुतों के जीवन में समृद्धि लेकर आते हैं। अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ के अनुसार, 2025 में भारत की कुल दिवाली बिक्री ₹6.05 लाख करोड़ तक पहुँच गई। इस आँकड़ों में वस्तुओं से ₹5.40 लाख करोड़ और सेवाओं से ₹65,000 करोड़ की बिक्री शामिल है। ये सिर्फ त्योहारों के बाद कि स्थिति है, इसके बाद शादियों का सीजन आएगा।
हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान भारतीय अर्थव्यवस्था की सशक्त रीढ़ हैं क्योंकि ये न केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध करते हैं, बल्कि देश की GDP, रोजगार सृजन, पर्यटन, लघु उद्योग, और व्यापार क्षेत्रों में भी अपना मजबूत आर्थिक योगदान देते हैं।
इन त्योहारों में हर समुदाय, हर जाति धर्म के लोग आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं, जो किसी अन्य मजहब के त्योहारों से उतनी नहीं होती, इसलिए मेरा एक प्रश्न है, हिंदुओं के कन्वर्जन पर इतना जोर क्यों, जब तक हिन्दू हैं, तभी तक हिंदुस्तान में भाई-चारा है, समृद्धि है, विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या हिंदुओं में ये जागृति आई है, या वे अब भी सुशुप्तावस्था में हैं।
भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है — जहाँ अध्यात्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे में रचे-बसे हैं। यहाँ के त्यौहार और धार्मिक अनुष्ठान सिर्फ़ पूजा-पाठ या परंपरा का पालन नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के विशाल केंद्र हैं। यही कारण है कि यह कहना गलत नहीं होगा कि — “हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान त्यौहार मात्र नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।”
भारत को यदि केवल एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखा जाए तो यह अधूरा दृष्टिकोण होगा, क्योंकि यहाँ की संस्कृति और अर्थव्यवस्था दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हमारे धार्मिक अनुष्ठान और त्यौहार केवल आस्था या भक्ति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे पुरानी और स्थायी जीवनरेखा हैं। हर वर्ष जब दीपावली, होली, नवरात्रि, गणेशोत्सव, रथयात्रा, छठ पूजा या मकर संक्रांति जैसे पर्व आते हैं, तब केवल मंदिरों और घरों में पूजा ही नहीं होती, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका भी प्रज्ज्वलित होती है। कारीगरों के हाथों में नए रंग आते हैं, व्यापारियों की दुकानों में रौनक लौटती है, किसानों की फसलों को बाजार मिलता है, बुनकर, मूर्तिकार, फूलवाले, मिठाईवाले, बर्तनवाले और आधुनिक डिजिटल विक्रेता – सभी की जीविका सीधे इन अनुष्ठानों से जुड़ी होती है।
भारत में धर्म और संस्कृति केवल आस्था के विषय नहीं हैं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था के संचालन की आधारशिला भी हैं। हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान और त्यौहार हमारी जीवनशैली में इतनी गहराई से जुड़े हैं कि वे न केवल सामाजिक एकता का माध्यम हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से भी सीधे जुड़े हुए हैं। इन अवसरों पर कुम्हार, कारीगर, फूलवाले, हलवाई, वस्त्र निर्माता, पंडित और परिवहनकर्मी — सबकी आमदनी बढ़ती है। यह त्यौहार-आधारित आर्थिक चक्र ही ग्रामीण और लघु उद्योगों को जीवंत बनाए रखता है।
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत में त्यौहारों के मौसम में खुदरा व्यापार में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। यह वृद्धि केवल शहरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि गाँवों में भी रोजगार और उत्पादन के नए अवसर खोलती है। हस्तशिल्प, खिलौने, पूजा सामग्री, मिठाई और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में लाखों परिवारों की जीविका इन्हीं पर्वों पर टिकी होती है।इन अनुष्ठानों के माध्यम से देश के भीतर स्वदेशी उत्पादों के उपयोग और स्थानीय व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है। यह आत्मनिर्भर भारत की भावना को भी बल देता है।अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन हैं। वे न केवल लोगों के मनों को जोड़ते हैं, बल्कि देश की आर्थिक नसों में नई ऊर्जा भी संचारित करते हैं। संस्कृति और समृद्धि का यह अद्भुत संगम ही भारत की असली पहचान है।
त्योहारों तक ही बात सीमित नहीं धार्मिक पर्यटन जैसे -प्रयागराज महाकुंभ, अयोध्या, वाराणसी, तिरुपति, शिरडी, वैष्णो देवी, आदि जैसे स्थलों में हज़ारों करोड़ रुपये का आर्थिक लेन-देन करता है जिससे आस-पास के शहरों, कस्बों और गांवों के व्यापार में तेज़ी आती है। सरकार भी इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन, स्वच्छता, और सुरक्षा में बड़े पैमाने पर खर्च करती है, इस कारण स्थानीय लोगों को और रोजगार मिलता है।
फिर सबसे महत्वपूर्ण है जो पूरे वर्ष राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैमंदिर अर्थव्यवस्था, भारत की GDP में धार्मिक यात्राओं का योगदान लगभग 2.32% है और अकेले मंदिर अर्थव्यवस्था की अनुमानित कीमत ₹3.02 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। देश में 2 मिलियन (20 लाख) से अधिक मंदिर हैं, जहाँ सरकारी और स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों को रोजगार मिलता है — पुजारी, कर्मचारी, विक्रेता, फूलवाले, हलवाई, और अन्य छोटे व्यवसाय।
मंदिर और धार्मिक अनुष्ठान केवल धर्म तक सीमित नहीं हैं, वे सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता, और स्थायी आजीविका का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों के कारण कृषि, हस्तशिल्प, पर्यटन, होटल, परिवहन समेत कई आर्थिक धारा मजबूत होती है। इसलिए, हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रेरक शक्ति हैं, जो न केवल आस्था को जीवंत रखते हैं बल्कि राष्ट्र के आर्थिक इंजन को भी गति देने में अविस्मरणीय भूमिका निभाते हैं। इसलिए गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, अपनी सनातन संस्कृति और परम्पराओं की सुरक्षा करो, यदि राष्ट्र प्रेम है तो हिंदुत्व की रक्षा हमारा परम् कर्तव्य है।


