रायपुर/कोरबा (सलवा जुडूम मीडिया) नवा रायपुर में ग्रामीणों के निस्तार और मवेशियों की चराई के लिए उपयोग में आने वाली शासकीय भूमि को निजी कंपनी को फिल्म सिटी निर्माण के लिए आवंटित किए जाने का मामला अब तूल पकड़ता नजर आ रहा है। आरोप है कि वर्ष 2006 में जिस भूमि को विशेष शर्तों के साथ पर्यटन विभाग को केवल ‘पिकनिक स्पॉट’ के लिए हस्तांतरित किया गया था, उसी भूमि को बाद में व्यावसायिक परियोजना के लिए निजी कंपनी को सौंपने की प्रक्रिया अपनाई गई।

मामले को लेकर स्थानीय सजग नागरिक एवं आवेदक जितेंद्र कुमार साहू (कोरबा) ने मुख्य सचिव सहित पर्यटन विभाग के उच्च अधिकारियों को शिकायत भेजकर पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। शिकायत में वर्ष 2006 के भूमि हस्तांतरण आदेश और 21 नवंबर 2025 को जारी लेटर ऑफ अवॉर्ड क्रमांक 3686/Plg/649(1)1-A/25 का हवाला दिया गया है।

क्या है भूमि आवंटन का मामला?
शिकायत के मुताबिक, वर्ष 2006 में अपर कलेक्टर रायपुर के आदेश के माध्यम से ग्राम माना के खसरा नंबर 1684/2, 1795 एवं 1882/2, ग्राम तूता के खसरा नंबर 408/1 तथा ग्राम निमोरा के खसरा नंबर 815 एवं 817 की कुल 40 हेक्टेयर से अधिक शासकीय घास/चराई भूमि को छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 237(2) के तहत पर्यटन विभाग को हस्तांतरित किया गया था।

आरोप है कि उस समय भूमि के उपयोग को लेकर स्पष्ट शर्त थी कि इसे केवल ‘पिकनिक स्पॉट’ के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा। इसके अलावा ग्राम माना के कुछ खसरों में वन विभाग की नर्सरी तथा ग्राम निमोरा के खसरा नंबर 815 में स्थित वृक्षारोपण को सुरक्षित रखने की शर्त भी बताई गई है।
लेकिन शिकायतकर्ता का दावा है कि छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल ने 21 नवंबर 2025 को M/s Inderdeep Infra India Ltd., उल्हासनगर, ठाणे, महाराष्ट्र को DBFOT मॉडल पर ‘चित्रोत्पला फिल्म सिटी’ परियोजना के लिए लेटर ऑफ अवॉर्ड जारी किया। इसी को लेकर भूमि के मूल उद्देश्य और आवंटन की शर्तों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
शिकायत में जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य (2011) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सार्वजनिक उपयोग की ग्रामीण भूमि, जिसमें चरागाह और निस्तार भूमि शामिल है, की सुरक्षा को लेकर दिए गए निर्देशों का हवाला दिया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि ग्रामीणों की पारंपरिक निस्तार और चराई से जुड़ी भूमि को निजी व्यावसायिक परियोजना के लिए उपयोग किए जाने से पहले कानूनी स्थिति और मूल आवंटन की शर्तों की गंभीरता से जांच आवश्यक है।

नर्सरी और वृक्षारोपण को लेकर भी चिंता
मामले में पर्यावरणीय पहलू भी उठाया गया है। शिकायत के अनुसार, वर्ष 2006 के आदेश में वन विभाग की नर्सरी और वृक्षारोपण को सुरक्षित रखने की शर्त शामिल थी। ऐसे में फिल्म सिटी जैसी बड़े पैमाने की परियोजना के लिए निर्माण कार्य शुरू होने से इन हरित क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

बाहरी कंपनी को लाभ पहुंचाने का आरोप
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि स्थानीय ग्रामीणों के निस्तार और मवेशियों की चराई से जुड़ी भूमि को निजी व्यावसायिक परियोजना के लिए उपलब्ध कराने से ग्रामीण हित प्रभावित होंगे। साथ ही स्थानीय कलाकारों और क्षेत्रीय संसाधनों के बजाय महाराष्ट्र की निजी कंपनी को परियोजना का लाभ दिए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित विभाग और कंपनी का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। पूरे मामले में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि वर्ष 2006 में भूमि हस्तांतरण के समय लगाई गई शर्तों के तहत बाद में फिल्म सिटी जैसी व्यावसायिक परियोजना की अनुमति किस आधार पर दी गई और इसके लिए कौन-कौन सी वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी की गईं।

15 दिन का अल्टीमेटम, हाईकोर्ट जाने की चेतावनी
जितेंद्र कुमार साहू ने शिकायत के माध्यम से मांग की है कि विवादित लेटर ऑफ अवॉर्ड को निरस्त कर भूमि को ग्रामीणों के पारंपरिक निस्तार अधिकारों के अनुरूप सुरक्षित किया जाए। उनका कहना है कि यदि शिकायत पर 15 दिनों के भीतर उचित कार्रवाई नहीं होती है, तो वे मामले को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करेंगे।

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन-प्रशासन पूरे मामले में भूमि हस्तांतरण की मूल शर्तों, ग्रामीणों के निस्तार अधिकारों, पर्यावरणीय प्रावधानों और निजी कंपनी को जारी लेटर ऑफ अवॉर्ड की वैधानिकता की जांच करेगा? या फिर यह विवाद न्यायालय की चौखट तक पहुंचेगा—इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
नोट: प्रकाशन से पहले 2006 के अपर कलेक्टर आदेश, 21 नवंबर 2025 के लेटर ऑफ अवॉर्ड और शिकायत पत्र की प्रतियां देखकर खसरा नंबर, कंपनी का नाम और आदेश की शर्तें एक बार मिलान कर लेना बेहतर रहेगा। इससे खबर और अधिक मजबूत तथा दस्तावेज-आधारित बनेगी।


